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आगामी 20 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में सरकार देश के आर्थिक और व्यावसायिक ढांचे को मजबूत करने के लिए दो बेहद महत्वपूर्ण विधेयक पेश करने जा रही है। इसमें पहला 'आयकर (संशोधन) विधेयक, 2026' है, जो पिछले महीने विदेशी निवेशकों को राहत देने के लिए लाए गए अध्यादेश का स्थान लेगा। इसके साथ ही, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के विकास और उनकी व्यापारिक सुगमता को बेहतर बनाने के लिए 'सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026' भी पेश किया जाएगा। ये विधायी सुधार देश में विदेशी पूंजी के प्रवाह को बढ़ाने और घरेलू छोटे उद्योगों की सुरक्षा के लिहाज से एक बड़े नीतिगत कदम के रूप में देखे जा रहे हैं।
इस नए विधेयक का प्राथमिक लक्ष्य भारत के सरकारी ऋण बाजार (सोवेरेन डेट मार्केट) को और अधिक गहरा बनाना, स्थिर वैश्विक पूंजी प्रवाह को आकर्षित करना और बाजार में नकदी (लिक्विडिटी) को बढ़ाना है। वर्तमान समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था में भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आ रही बाधाओं के कारण भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। पश्चिम एशिया के संकट के कारण भारतीय रुपये पर बने दबाव को कम करने और देश में विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए इस विधायी संशोधन का निर्णय लिया गया है।
इस विधेयक के तहत विदेशी निवेशकों को सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) में निवेश से होने वाली ब्याज आय और पूंजीगत लाभ (कैपिटल गेन्स) पर आयकर से पूरी छूट दी जाएगी। भारत में सामान्य कर नियमों के अनुसार, विदेशी निवेशकों को 12 महीने से अधिक समय तक रखे गए सूचीबद्ध शेयरों और बॉन्ड पर 12.5 प्रतिशत का दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर (एलटीसीजी) देना होता है। इसके अलावा, सरकारी बॉन्ड से अर्जित ब्याज पर उन्हें 20 प्रतिशत का विदहोल्डिंग टैक्स भी चुकाना पड़ता है। सरकार द्वारा दी जा रही इस नई कर छूट से विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करना बेहद आकर्षक हो जाएगा। यह कर छूट 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी मानी जाएगी।
चूंकि इस नीतिगत बदलाव को तुरंत लागू करने की आवश्यकता थी और उस समय संसद का सत्र नहीं चल रहा था, इसलिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत अपनी अध्यादेश बनाने की शक्तियों का उपयोग करते हुए 'आयकर (संशोधन) अध्यादेश, 2026' जारी किया था। 5 जून को जारी राजपत्र (गजट) अधिसूचना के माध्यम से इसे लागू किया गया था। इस अध्यादेश में 'बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स' (BIS) को परिभाषित किया गया है, जो कि 1930 में स्थापित हुआ था और इसका मुख्यालय बेसेल, स्विट्जरलैंड में है। अब संसद सत्र शुरू होने पर इस अध्यादेश को नियमित विधेयक से बदला जाएगा। इसके अतिरिक्त, सरकार इस सत्र में वर्ष 2022-23 के लिए अतिरिक्त अनुदानों की मांगें भी पेश करेगी।
एमएसएमई क्षेत्र के लिए लाया जा रहा नया संशोधन विधेयक पूरी तरह से व्यापार सुगमता (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) और 'भरोसे पर आधारित नियमों' पर केंद्रित है। इसका मुख्य उद्देश्य 2006 के मूल एमएसएमई अधिनियम को आज के बदलते व्यावसायिक परिदृश्य के अनुकूल बनाना है। इसके तहत निम्नलिखित सुधार किए जाएंगे:
देरी से भुगतान पर लगाम: छोटे और सूक्ष्म उद्योगों के लिए सबसे बड़ी समस्या उनके बकाये भुगतान में होने वाली देरी है। यह बिल देरी से होने वाले भुगतानों के समाधान तंत्र को काफी मजबूत करेगा।
मध्यस्थता निर्णयों को लागू करना: सूक्ष्म और लघु उद्यमों के पक्ष में आने वाले मध्यस्थता निर्णयों को लागू करने का सख्त प्रावधान किया जाएगा।
राज्यों को अधिक लचीलापन: राज्यों को सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषद (एमएसईएफसी) के गठन और संरचना को तय करने के लिए आवश्यक लचीलापन और सक्षम प्रावधान प्रदान किए जाएंगे।
संसद के इस मानसून सत्र में पेश होने वाले दोनों ही विधेयक भारत के घरेलू और बाहरी आर्थिक मोर्चों को संतुलित करने का काम करेंगे। एक तरफ जहां आयकर संशोधन विदेशी निवेशकों के भरोसे को बढ़ाकर वैश्विक वित्तीय अस्थिरता के बीच रुपये को मजबूती प्रदान करेगा, वहीं दूसरी तरफ एमएसएमई विधेयक देश के सबसे बड़े रोजगार प्रदाता क्षेत्र को सुरक्षा और सुगमता प्रदान करेगा।
Source: https://www.amarujala.com/business/business-diary/monsoon-session-govt-to-introduce-income-tax-and-msme-amendment-bills-to-foster-ease-of-doing-business-2026-07-16