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भारत में सार्वजनिक संपत्तियों और बुनियादी ढांचे में जंग (करॉजन) लगने से हर साल देश को एक भारी-भरकम आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस समस्या से निपटने और घरेलू उद्योग को मजबूत करने के लिए इंडियन स्टेनलेस स्टील डेवलपमेंट एसोसिएशन (आईएसएसडीए) और ग्लोबल स्टेनलेस स्टील एक्सपो (जीएसएसई) ने केंद्र सरकार से 'राष्ट्रीय स्टेनलेस स्टील नीति' और 'राष्ट्रीय एंटी-करॉजन नीति' लागू करने की पुरजोर मांग की है।
उद्योग के आंकड़ों के अनुसार भारत में सटेनलेस स्टील का उत्पादन की क्षमता लगभग 75 लाख टन है, लेकिन वर्तमान में इसका इसका केवल 60 से 65 प्रतिशत ही इस्तेमाल हो रहा है। जबकि घरेलू मांग का लगभग 25 से 28 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा किया जाता, विशेषकर चीन से आयात किया जाता है। आईएसएसडीए के अध्यक्ष राजामणि कृष्णमूर्ति ने बताया, भारत के पास स्टेनलेस स्टील में वैश्विक नेतृत्व करने और उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के साथ तकनीकी विशेषज्ञता है, लेकिन ठोस नीति की जरूरत है।
उन्होंने बताया मौजूदा समय में उद्योग दो बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है, पहला सस्ता आयात और दूसरा ठोस नीति का अभाव। स्टेनलेस स्टील को अभी भी सामान्य स्टील की श्रेणी में रखा जाता है, जबकि इसकी निर्माण प्रक्रिया, कच्चे माल की आवश्यकता और उपयोग के क्षेत्र पूरी तरह अलग हैं। एक अलग राष्ट्रीय स्टेनलेस स्टील नीति कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करेगी, निवेश को प्रोत्साहित करेगी और भारत को वैल्यू-एडेड स्टेनलेस स्टील का वैश्विक केंद्र बनाने में मदद करेगी।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि, करॉजन उद्योग के लिए सबसे बड़ी चुनौती है, भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 4 प्रतिशत, यानी करीब 12 लाख करोड़ रुपये हर वर्ष सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, परिवहन, औद्योगिक परिसंपत्तियों और उपयोगिता सेवाओं में जंग के कारण गंवा देता है। इस नुकसान का बड़ा हिस्सा रोका जा सकता है। जिसको राष्ट्रीय एंटी-करॉजन नीति के जरिए से रोका जा सकता है। राष्ट्रीय एंटी-करॉजन नीति के माध्यम से जीवनचक्र आधारित (Lifecycle-Based) इंफ्रास्ट्रक्चर योजना को बढ़ावा मिलेगा और विशेष रूप से भारत के विशाल तटीय क्षेत्रों में जंग-रोधी सामग्रियों के उपयोग को प्रोत्साहन मिलेगा, जहां स्टेनलेस स्टील अधिक टिकाऊ, कम रखरखाव वाला और आर्थिक रूप से बेहतर विकल्प है। निर्माण के समय सही सामग्री में निवेश करना बाद में बार-बार मरम्मत और पुनर्निर्माण करने की तुलना में कहीं अधिक किफायती है।
कृष्णमूर्ति ने बताया कि भारत में प्रति व्यक्ति स्टेनलेस स्टील की खपत केवल 3.5 किलोग्राम है, जबकि वैश्विक औसत 6 से 7 किलोग्राम है। उन्होंने कहा, यदि भारत केवल वैश्विक औसत तक पहुंच जाए तो अतिरिक्त 30 से 40 लाख टन उत्पादन क्षमता की आवश्यकता होगी। केंद्र सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे, रेलवे, शहरी विकास, नवीकरणीय ऊर्जा और विनिर्माण क्षेत्र में किए जा रहे निवेश के साथ स्टेनलेस स्टील टिकाऊ और दीर्घकालिक परिसंपत्तियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है तथा बड़े पैमाने पर रोजगार और निवेश को बढ़ावा दे सकता है। विर्गो कम्युनिकेशंस एंड एग्जीबिशन्स (प्रा.) लिमिटेड की प्रबंध निदेशक अनीता रघुनाथ ने कहा, हमारा उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में स्टेनलेस स्टील के उपयोग को बढ़ावा देना, नई तकनीकों के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करना और भारत सहित वैश्विक बाजारों में उद्योग के लिए नए अवसर पैदा करना है।
Source: https://www.amarujala.com/business/business-diary/indian-stainless-industry-demands-implementation-of-national-stainless-steel-policy-2026-07-01