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तसलीमा नसरीन का जन्म 1962 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के मयमनसिंह में हुआ था। उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई की और स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में काम करना शुरू किया। बाद में उन्होंने पूर्णकालिक लेखन को अपना पेशा बना लिया। महिलाओं के अधिकार, धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक कट्टरता पर उनके लेखन ने उन्हें दक्षिण एशिया की सबसे चर्चित लेखिकाओं में शामिल करा दिया। उन्होंने 40 से अधिक किताबें लिखी हैं, जिनका 30 से ज्यादा भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उन्हें 1992 में 'निर्वाचित कॉलम' और 2000 में आत्मकथा 'आमार मेयेबेला' के लिए आनंद पुरस्कार मिला। 1994 में उन्हें मानवाधिकार के क्षेत्र में दिए जाने वाले सखारोव पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
तसलीमा 1993 में प्रकाशित अपने उपन्यास 'लज्जा' से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आईं। इस उपन्यास में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों को दिखाया गया था। किताब और उनके अखबारों में लिखे लेखों के कारण बांग्लादेश में उनके खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, मौत की धमकियां मिलीं और फतवे जारी किए गए। हालात ऐसे बने कि 1994 में उन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा और तभी से वह निर्वासन का जीवन जी रही हैं। उनका कहना रहा है कि धार्मिक कट्टरता की आलोचना करने के कारण उन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा।
बांग्लादेश छोड़ने के बाद तसलीमा ने यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कई देशों में समय बिताया। उन्हें स्वीडन की नागरिकता भी मिली। करीब 10 साल विदेश में रहने के बाद वह 2004 में भारत आईं और कोलकाता में बस गईं। बंगाली भाषा और संस्कृति से गहरे जुड़ाव के कारण वह कोलकाता को अपना दूसरा घर बताती थीं और बंगाली अखबारों में नियमित लेख भी लिखती थीं।
तसलीमा नसरीन की मुश्किलें उनकी आत्मकथा के प्रकाशन के साथ लगातार बढ़ती गईं। 1998 में उनकी आत्मकथा का पहला भाग 'मेयेबेला' (My Bengali Girlhood) प्रकाशित हुआ। लेकिन बड़ा विवाद 2003 में आत्मकथा के दूसरे भाग 'द्विखंडितो' (Dwikhondito) के प्रकाशन के बाद शुरू हुआ। इस पुस्तक के कुछ अंशों को धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया गया। 18 नवंबर 2003 को कवि सैयद हसमत जलाल द्वारा दायर मानहानि याचिका पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने पुस्तक के प्रकाशन पर अंतरिम रोक लगाने की अनुमति दी। इसके दस दिन बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा (सीपीएम) सरकार ने यह कहते हुए पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया कि इससे सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है। हालांकि, प्रकाशक ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी। सितंबर 2005 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने प्रतिबंध को रद्द करते हुए कहा कि पुस्तक का उद्देश्य किसी धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था और सरकार का प्रतिबंध उचित नहीं है। इसी दौरान 2004 में केंद्र सरकार से अस्थायी रेजिडेंस परमिट मिलने के बाद तसलीमा कोलकाता आ गईं। वह यहां रहने लगीं और बंगाली अखबारों में नियमित रूप से लेख लिखने लगीं। लेकिन 'द्विखंडितो' को लेकर विवाद और विरोध खत्म नहीं हुआ। जून 2006 में कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के तत्कालीन इमाम सैयद नूर-उर-रहमान बरकती ने तसलीमा का चेहरा काला करने वाले को इनाम देने की घोषणा कर दी। कई संगठनों ने उन्हें भारत से बाहर भेजने की मांग भी उठाई। इसके बाद अगस्त 2007 में हैदराबाद में उनके उपन्यास 'शोध' के तेलुगु अनुवाद के कार्यक्रम के दौरान कथित तौर पर एआईएमआईएम से जुड़े लोगों ने उनके साथ धक्का-मुक्की की। हालांकि उसी वर्ष 'द्विखंडितो' के विवादित अंश हटा दिए गए, लेकिन नवंबर 2007 में कोलकाता में हालात फिर बिगड़ गए। ऑल इंडिया माइनॉरिटी फोरम के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान सड़क जाम, हिंसा और आगजनी की घटनाएं हुईं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार को सेना बुलानी पड़ी। सरकार को आशंका थी कि अगर तसलीमा कोलकाता में रहीं तो हालात और बिगड़ सकते हैं। राजनीतिक दबाव के बीच वरिष्ठ माकपा नेता बिमान बोस समेत कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से उनसे शहर छोड़ने की अपील की। इसके बाद सरकार ने तसलीमा पर कोलकाता छोड़ने का दबाव बनाया। उन्हें पहले शहर से बाहर भेजा गया और बाद में वह नई दिल्ली पहुंच गईं।
2008 में वह भारत से बाहर चली गईं और यूरोप व अमेरिका में रहीं। 2011 में वह फिर भारत लौटीं। 2015 में आतंकी संगठनों की धमकियों के बीच अमेरिका चली गईं, लेकिन 2017 से लगातार भारत में रह रही हैं। पिछले करीब 10 वर्षों से वह दिल्ली में रेजिडेंट परमिट पर रह रही हैं और उनके परमिट की अवधि लगातार बढ़ाई जाती रही है। 2024 में उन्होंने सोशल मीडिया पर परमिट बढ़ाने की अपील की थी, जिसके कुछ घंटे बाद उसका विस्तार कर दिया गया था।
तसलीमा नसरीन ने स्वयं सोशल मीडिया पर बताया है कि वह 1 अगस्त को कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित कट्टरता-विरोधी साहित्यिक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगी। इस कार्यक्रम में वह अपनी कविता संग्रह 'बंदिनी' से कविताएं पढ़ेंगी, जो उन्होंने दिल्ली में नजरबंदी के दौरान लिखी थीं और जिनका केंद्र कोलकाता है। कार्यक्रम के आयोजकों का कहना है कि यह उनकी लगभग 20 साल बाद शहर में वापसी का उत्सव होगा। आयोजकों के अनुसार, 2007 में तत्कालीन वाम सरकार ने कट्टरपंथी ताकतों के दबाव में उन्हें शहर छोड़ने पर मजबूर किया था। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को भी आमंत्रित किया गया है। हालांकि आयोजकों ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल उनके स्थायी रूप से कोलकाता में बसने को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई है। दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल सरकार उनके कोलकाता में रहने संबंधी प्रस्ताव भेजने पर विचार कर रही है।
तसलीमा नसरीन की वापसी अब राजनीतिक मुद्दा भी बन गई है। भाजपा का कहना है कि पिछली वामपंथी और तृणमूल कांग्रेस सरकारों ने वोट बैंक की राजनीति के कारण उन्हें कभी कोलकाता लौटने नहीं दिया। पिछले वर्ष भाजपा के राज्यसभा सांसद समिक भट्टाचार्य ने संसद में भी उनकी वापसी का मुद्दा उठाया था। वहीं, तसलीमा कई बार कह चुकी हैं कि वह किसी राजनीतिक दल के हाथों की फुटबॉल नहीं बनना चाहतीं। उनका कहना है कि उन्हें सिर्फ शांति से कोलकाता आकर साहित्य उत्सवों और पुस्तक मेलों में भाग लेने की अनुमति मिलनी चाहिए। अमर उजाला बैठक की चौथी कड़ी में उन्होंने कहा था कि दरअसल मेरी लड़ाई किसी मजहब के खिलाफ है ही नहीं। यह लड़ाई स्वतंत्रता बनाम परतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता बनाम धर्मांधता, मानवीयता बनाम अमानवीयता की लड़ाई है। सभी सभ्यताएं और धर्म, आलोचनाओं की राह से गुजरने के बाद ही प्रकाशमान होते हैं। आलोचना और विश्लेषण से बचाकर किसी का भी पुनर्जागरण नहीं होता।
Source: https://www.amarujala.com/india-news/why-is-taslima-nasrin-returning-to-kolkata-after-almost-two-decades-understanding-her-exile-exit-2026-07-15