राम मंदिर ट्रस्ट के गठन के बाद से ही पर्दे के पीछे बैकडोर एंट्री का एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा था. मंदिर के बेहद संवेदनशील वित्तीय कामकाज और करोड़ों रुपये की नकदी संभालने की जिम्मेदारी ऐसे लोगों को सौंप दी गई, जिनकी एकमात्र योग्यता ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और अन्य प्रभावशाली पदाधिकारियों का करीबी होना था.
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