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प्रसेनजीत बोस की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण ने कहा कि हटाए गए मतदाताओं के दावों और आपत्तियों की सुनवाई के लिए बनाए गए 18 न्यायाधिकरणों का कामकाज सही ढंग से नहीं चल रहा है। इससे व्यावहारिक स्तर पर गड़बड़ियां और देरी हो रही है।
उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटने के कारण लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली और अन्नपूर्णा जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है। उन्हें जाति प्रमाण पत्र भी नहीं दिए जा रहे हैं।
याचिका में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान गणना चरण में 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए।
दावों और आपत्तियों के चरण में नाम जोड़ने के लिए 9.64 लाख आवेदन और नाम हटाने के लिए 99 हजार से अधिक आवेदन मिले। लेकिन 28 फरवरी को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में केवल करीब 1.82 लाख नए नाम ही जोड़े गए।
याचिकाकर्ता का कहना है कि निर्वाचन आयोग ने विधानसभा क्षेत्रवार यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की कि कितने आवेदन मिले, कितने स्वीकार किए गए और कितने खारिज किए गए। इससे पूरी प्रक्रिया की सार्वजनिक जांच सीमित हो गई है।
जनहित याचिका में कहा गया है कि विस्तृत आंकड़े और वर्ष 2024 की मतदाता सूची नियमावली में तय प्रारूप सार्वजनिक नहीं किए गए। इससे पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही कमजोर हुई है।
याचिका में 60 लाख से अधिक मामलों को 'तार्किक विसंगति' वाला बताकर चिह्नित किए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं।
याचिका के अनुसार, माता-पिता और बच्चों की उम्र में अंतर, एक परिवार से कई संबंध और नामों में अंतर जैसे मानदंड अपनाए गए, जबकि इनका जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 या विशेष गहन पुनरीक्षण की अधिसूचनाओं में कोई आधार नहीं है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन्हीं आधारों पर लोगों को नोटिस भेजे गए और बड़ी संख्या में उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। लेकिन इस कार्रवाई का आधार पर्याप्त पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक नहीं किया गया।
Source: https://www.amarujala.com/india-news/sc-seeks-responses-of-ec-bengal-govt-on-plea-for-data-on-claims-of-voters-deleted-under-sir-2026-07-17