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बांग्लादेश ने तीस्ता नदी परियोजना के लिए चीन का हाथ थाम लिया है। प्रधानमंत्री तारिक रहमान की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों ने इस परियोजना की फीजिबिलिटी स्टडी कराने का समझौता किया। फिलहाल यह केवल शुरुआती अध्ययन है, लेकिन इसे चीन के बढ़ते रणनीतिक प्रभाव के रूप में देखा जा रहा है। यह परियोजना भारत के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बेहद करीब है।
तीस्ता नदी का उद्गम सिक्किम के पूर्वी हिमालय में होता है। इसके बाद यह पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है और अंत में जमुना (भारत में ब्रह्मपुत्र) नदी में मिल जाती है। तीस्ता नदी की कुल लंबाई 414 किलोमीटर है, जिसमें से लगभग 113 किलोमीटर हिस्सा बांग्लादेश में बहता है, जबकि शेष भाग भारत (सिक्किम और पश्चिम बंगाल) में स्थित है। यह नदी दोनों देशों के लिए सिंचाई, कृषि, पेयजल, मत्स्य पालन और बाढ़ नियंत्रण का प्रमुख स्रोत है। खासकर बांग्लादेश के उत्तरी जिलों की खेती काफी हद तक इसी नदी पर निर्भर है। हालांकि सर्दियों में पानी की भारी कमी और मानसून में बाढ़ यहां की सबसे बड़ी समस्या है।
तीस्ता रिवर कॉम्प्रिहेंसिव मैनेजमेंट एंड रिस्टोरेशन प्रोजेक्ट बांग्लादेश की सबसे बड़ी नदी प्रबंधन परियोजनाओं में से एक है। अमेरिकी विश्विविद्यालय लॉक हेवन की रिसर्च के अनुसार, इस परियोजना का मकसद तीस्ता नदी को इस तरह विकसित करना है कि पानी का बेहतर इस्तेमाल हो सके और नदी से जुड़ी समस्याएं कम हों। इसके लिए सात मुख्य लक्ष्य तय किए गए हैं।
नदी की चौड़ाई कम करके उसे अधिक गहरा बनाना।
नदी में नौकाओं का आवागमन आसान बनाना।
सिंचाई के लिए अधिक पानी उपलब्ध कराना।
नई जमीन विकसित करना और पानी का भंडारण बढ़ाना।
रिसर्च के अनुसार, इस परियोजना में कई बड़े निर्माण कार्य प्रस्तावित हैं।
डोआनी-दालिया बैराज से चिलमारी तक नदी के दोनों किनारों पर 114 किलोमीटर लंबे तटबंध बनाए जाएंगे।
नदी की चौड़ाई को 700 से 1,000 मीटर के बीच सीमित किया जाएगा।
नदी की 10 मीटर तक खुदाई (ड्रेजिंग) की जाएगी ताकि वह अधिक गहरी हो सके।
लगभग 170 वर्ग किलोमीटर नई जमीन तैयार की जाएगी।
इस जमीन पर औद्योगिक क्षेत्र, आवासीय इलाके, कृषि परियोजनाएं और 500 मेगावाट का सौर ऊर्जा संयंत्र विकसित करने का प्रस्ताव है।
इसके अलावा 3 यात्री टर्मिनल, 11 माल ढुलाई टर्मिनल, जल भंडारण संरचनाएं, सड़कें, ग्रोइन (कटाव रोकने वाली संरचनाएं), क्रॉस बार और तटबंध बनाए जाएंगे।
बांग्लादेश का दावा है कि इससे बाढ़ कम होगी, खेती बेहतर होगी, रोजगार बढ़ेगा और नदी किनारे आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।
जुलाई 2019 में प्रधानमंत्री शेख हसीना की चीन यात्रा के दौरान चीन ने तीस्ता परियोजना में सहयोग का आश्वासन दिया था।
इसके बाद बांग्लादेश ने चीन की सरकारी पावर कंपनी के साथ तकनीकी सहयोग और लगभग 853 मिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता पर सहमति बनी।
2020 में शेख हसीना सरकार ने इस परियोजना का खाका पेश किया। लेकिन आर्थिक कारणों और भारत की सुरक्षा चिंताओं के चलते इसे अंतिम मंजूरी नहीं मिली।
द डेली स्टार की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्रालय ने 2020 में आर्थिक संबंध प्रभाग (ERD) को पत्र लिखकर इस परियोजना के लिए चीन से 983.27 मिलियन डॉलर (करीब 98.3 करोड़ डॉलर) का कर्ज उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था। यह ऋण सीधे टीआरसीएमआरपी को लागू करने के लिए मांगा गया है।
अब तारिक रहमान सरकार ने चीन के साथ इस परियोजना को फिर से आगे बढ़ाने का फैसला किया है।
द डिप्लोमैट की रिपोर्ट के अनुसार, भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी के जल बंटवारे को लेकर बातचीत कई वर्षों से चल रही थी। 1983 में दोनों देशों ने एक अंतरिम व्यवस्था बनाई थी, लेकिन इसे कभी औपचारिक समझौते का रूप नहीं दिया गया। इसके बाद सितंबर 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बांग्लादेश यात्रा से ठीक पहले दोनों देशों के बीच एक मसौदा समझौता तैयार हुआ। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इसमें प्रस्ताव था कि 20% पानी पर्यावरणीय प्रवाह के लिए छोड़ा जाएगा, जबकि भारत को 42.5% और बांग्लादेश को 37.5% पानी मिलेगा। भविष्य में जल प्रवाह का सही आकलन करने के लिए एक संयुक्त हाइड्रोलॉजिकल ऑब्जर्वेशन स्टेशन स्थापित करने का भी प्रस्ताव था। हालांकि, यह समझौता अंतिम रूप नहीं ले सका। उस समय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि प्रस्तावित जल बंटवारे से उत्तर बंगाल के कूचबिहार, जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग जैसे जिलों की सिंचाई और पेयजल की जरूरतें पूरी नहीं हो पाएंगी। इसी कारण उन्होंने मनमोहन सिंह के साथ ढाका जाने से भी इनकार कर दिया। भारत की संघीय व्यवस्था में अंतरराज्यीय नदी के जल बंटवारे से जुड़े अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर संबंधित राज्य की सहमति महत्वपूर्ण मानी जाती है। पश्चिम बंगाल की आपत्तियों के चलते 2011 का मसौदा समझौता हस्ताक्षर तक नहीं पहुंच सका।
भारत ने एक बार फिर सहमति जताने की कोशिश करते हुए 2024 में इस परियोजना के लिए लगभग एक अरब डॉलर की वित्तीय सहायता देने का प्रस्ताव रखा था। इसका उद्देश्य था कि परियोजना भारत के सहयोग से पूरी हो। लेकिन इसी दौरान बांग्लादेश में राजनीतिक बदलाव हो गया। शेख हसीना सरकार चली गई और नई सरकार बनने के बाद भारत का प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाया। इसके बाद बांग्लादेश ने चीन के साथ सहयोग तेज कर दिया।
द डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन केवल तीस्ता परियोजना में ही नहीं बल्कि बांग्लादेश की जल प्रबंधन व्यवस्था को आधुनिक बनाने में भी सहयोग देना चाहता है। चीन ने नदी प्रबंधन तकनीक उपलब्ध कराने, नदी कटाव रोकने, सिंचाई व्यवस्था सुधारने, अंतर्देशीय जलमार्ग विकसित करने, बांग्लादेशी अधिकारियों को प्रशिक्षण देने, और जल संसाधन परियोजनाओं में सहयोग बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने चीन से चीन-बांग्लादेश फ्रेंडशिप हॉस्पिटल सहित अन्य विकास परियोजनाओं में भी सहयोग मांगा है। वहीं, चीन ने बांग्लादेश की संप्रभुता, सुरक्षा और आर्थिक विकास में समर्थन जारी रखने का भरोसा दिया। दोनों देशों के बीच 13 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर हुए, जिनमें व्यापार, निवेश, आधारभूत संरचना, जल संसाधन और राजनीतिक सहयोग शामिल हैं।
जापान, विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक (ADB) के बाद चीन बांग्लादेश का चौथा सबसे बड़ा कर्जदाता है। 1975 से अब तक चीन बांग्लादेश को 7.5 अरब डॉलर का कर्ज दे चुका है। चीन पहले ही पद्मा ब्रिज समेत कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पूरे कर चुका है।
भारत की सबसे बड़ी चिंता इस परियोजना की भौगोलिक स्थिति है। परियोजना का इलाका भारत के जलपाईगुड़ी जिले के सामने और सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बेहद करीब है। सिर्फ करीब 22 किलोमीटर चौड़ा यह कॉरिडोर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्से से जोड़ने वाला एकमात्र स्थलीय मार्ग है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर चीन को इस इलाके में लंबे समय तक इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के जरिए स्थायी मौजूदगी मिलती है तो यह भारत की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन सकता है। पावरचाइना जैसी सरकारी कंपनी के इस प्रोजेक्ट में शामिल होने को भी भारत रणनीतिक नजरिए से देख रहा है, क्योंकि विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की कई सरकारी कंपनियां उसकी व्यापक भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मानी जाती हैं।
भारत ने कहा है कि तीस्ता परियोजना पर अपनी चिंताओं से वह पहले ही बांग्लादेश को अवगत करा चुका है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा है कि भारत इस परियोजना से जुड़े सभी घटनाक्रमों पर नजर रख रहा है और आगे की नीति उसी के अनुसार तय करेगा। वहीं, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा है कि भारत तीस्ता और गंगा जल बंटवारे सहित सभी जल संबंधी मुद्दों पर संयुक्त नदी आयोग के तहत बांग्लादेश से बातचीत जारी रखेगा।
बांग्लादेश की ओर से रणनीतिक रूप से अहम मोंगला बंदरगाह के विकास की जिम्मेदारी चीन को सौंपने के फैसले को भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सामरिक झटका माना जा रहा है। यह वही परियोजना थी, जिसे वर्ष 2015 में भारत और तत्कालीन शेख हसीना सरकार के बीच हुए समझौते के तहत भारत को मिला था और 2018 में इसके विकास का ठेका हीरानंदानी ग्रुप को दिया गया था। हालांकि अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के सत्ता से हटने के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने अक्तूबर 2024 में भारत के साथ यह समझौता रद्द कर दिया। इसके बाद प्रधानमंत्री तारिक रहमान की चीन यात्रा के दौरान इस परियोजना को चीन की सरकारी कंपनी को सौंपने पर सहमति बनी। समझौते के तहत मोंगला बंदरगाह के आधुनिकीकरण के साथ बागेरहाट में इसके पास 110 एकड़ क्षेत्र को आर्थिक जोन के रूप में विकसित करने का फैसला किया गया। इस घटनाक्रम ने भारत की चिंता इसलिए बढ़ा दी क्योंकि मोंगला बंदरगाह भारत की समुद्री सीमा से लगभग 130 किलोमीटर और जमीनी सीमा से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित है। चीन पहले ही पाकिस्तान के ग्वादर, श्रीलंका के हंबनटोटा और जिबूती जैसे बंदरगाहों पर अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ा चुका था। ऐसे में मोंगला में उसकी भागीदारी को हिंद महासागर क्षेत्र में उसके बढ़ते प्रभाव के एक और कदम के रूप में देखा जा रहा है।
Source: https://www.amarujala.com/world/why-bangladesh-turned-to-china-on-the-teesta-project-and-why-it-matters-to-india-2026-07-17