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2016 में अरुणाचल प्रदेश में भी इस तरह का मामला देखने को मिला था। जब मुख्यमंत्री नबाम तुकी को छोड़कर पूरा विधायक दल पीपल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल में शामिल हो गया था। ये दल भाजपा के नेतृत्व वाले नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस का हिस्सा था। इसके चलते राज्य से कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। 31 दिसंबर 2016 को मुख्यमंत्री पेमा खांडू और अन्य 32 विधायक पीपल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। इसके साथ ही राज्य में पहली बार भाजपा की सरकार बनी थी। पेमा खांडू और साथियों के इस कदम के बाद 60 सदस्यों वाली राज्य विधानसभा में भाजपा विधायकों की संख्या 45 हो गई थी। वहीं, पीपीए के विधायकों संख्या 10 रह गई। वहीं, विधानसभा चुनाव जीतकर सरकार बनाने वाली कांग्रेस महज तीन सीटों पर सिमट गई थी।
सूत्रों का कहना है कि भाजपा भी तृणमूल को तोड़ने का आरोप अपने सिर पर नहीं लेना चाहती है। इसके साथ ही बगावत करने वाले गुट में शामिल कुछ सांसद ऐसे भी हैं जो पार्टी की पसंद भी नहीं हैं। यह भी एक वजह रही जिसके चलते भाजपा में बागियों का विलय नहीं किया गया। जबकि, कुछ दिन पहले ही आम आदमी पार्टी के राज्यसभा के बागियों का भाजपा में ही विलय किया गया है।
Source: https://www.amarujala.com/india-news/why-tmc-s-rebel-mps-took-the-ncpi-route-instead-of-joining-bjp-directly-2026-06-15