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पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ओमान के पास अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई। अमेरिकी सेना का दावा था कि जहाज ने उसके निर्देशों का पालन नहीं किया और वह ईरान से जुड़े प्रतिबंधों का उल्लंघन कर रहा था। वहीं जहाज के संचालक iOS Marine ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जहाज का ईरान या ईरानी तेल से कोई संबंध नहीं था। घटना के बाद भारत सरकार ने तीखी प्रतिक्रिया दी।
विदेश मंत्रालय ने भारत में अमेरिकी प्रभारी राजदूत जेसन मीक्स को तलब किया और औपचारिक विरोध-पत्र सौंपा।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत अपने समुद्री समुदाय की सुरक्षा और कल्याण को अत्यंत महत्व देता है तथा इस प्रकार की घटनाएं तुरंत बंद होनी चाहिए।
पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय ने बचाए गए नाविकों की वापसी की व्यवस्था की और मृतकों के परिवारों को सीमैन वेलफेयर फंड सोसायटी से 10-10 लाख रुपये की सहायता देने का निर्णय लिया।
सरकार ने यह भी बताया कि खाड़ी क्षेत्र में 18 हजार से अधिक भारतीय नाविक कार्यरत हैं और उनकी सुरक्षा को लेकर लगातार निगरानी रखी जा रही है।
पहले भी इस तरह के मामले आते रहे हैं, जिनमें सरकार की ओर से कूटनितिक हस्तक्षेप किया गया। आइये जानते हैं बीते 15 वर्षों में आए ऐसे ही कुछ मामलों के बारे में...
क्या हुआ था? 15 फरवरी 2012 को केरल तट के पास भारतीय मछुआरों की नाव सेंट एंटनी पर इटली के तेल टैंकर एरिका लेक्सी पर तैनात दो इतालवी मरीन ने गोलीबारी कर दी। मरीन ने नाव को समुद्री डाकुओं का जहाज समझा, लेकिन इस फायरिंग में दो भारतीय मछुआरों वैलेंटाइन जेलास्टिन और अजेश बिंकी की मौत हो गई। भारत ने क्या रुख अपनाया?
घटना के बाद भारतीय तटरक्षक बल ने जहाज को कोच्चि बंदरगाह लाने का आदेश दिया और दोनों मरीन को गिरफ्तार कर हत्या का मामला दर्ज किया।
इटली ने दावा किया कि घटना अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में हुई थी और केवल इटली को मुकदमा चलाने का अधिकार है, लेकिन भारत ने कहा कि पीड़ित भारतीय नागरिक थे, इसलिए भारत को कार्रवाई का पूरा अधिकार है।
-तत्कालीन यूपीए सरकार ने इटली के दबाव के बावजूद दोनों मरीन को तुरंत रिहा करने से इनकार कर दिया और मामला सुप्रीम कोर्ट से लेकर अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरणों तक चला।
लगभग आठ साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद 2020 में अंतरराष्ट्रीय पंचाट ने मरीन को आधिकारिक ड्यूटी के आधार पर प्रतिरक्षा दी, लेकिन भारतीय मछुआरों के परिवारों को मुआवजा देने का आदेश भी दिया।
यह मामला इसलिए अहम माना जाता है क्योंकि भारत ने पहली बार किसी बड़े यूरोपीय देश के सैन्यकर्मियों के खिलाफ अपने नागरिकों के लिए लंबी अंतरराष्ट्रीय कानूनी लड़ाई लड़ी और स्पष्ट संदेश दिया कि भारतीय नागरिकों की मौत के मामलों में वह पीछे नहीं हटेगा।
मामला क्या था? दिसंबर 2013 में न्यूयॉर्क में भारत की उप-महावाणिज्यदूत देवयानी खोबरागड़े को अमेरिकी अधिकारियों ने गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप कि उन्होंने अपनी घरेलू सहायक के लिए वीजा आवेदन में गलत जानकारी दी और अमेरिकी श्रम कानूनों के अनुसार वेतन न देकर कम वेतन दिखाया। अमेरिकी अभियोजकों का दावा था कि वीजा दस्तावेजों में जिस वेतन का उल्लेख किया गया, वास्तविक भुगतान उससे कम था। हालांकि भारत में विवाद आरोपों से ज्यादा गिरफ्तारी के तरीके को लेकर हुआ। भारत सरकार का कहना था कि एक कार्यरत भारतीय राजनयिक को सार्वजनिक रूप से गिरफ्तार किया गया, हथकड़ी लगाई गई, तलाशी ली गई और आम अपराधियों की तरह हिरासत में रखा गया। इसे भारत ने राजनयिक मर्यादा और राष्ट्रीय सम्मान का प्रश्न बताया। सरकार ने क्या रुख अपनाया?
तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने इस मामले पर कड़ा रुख अपनाया। भारत ने नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास और उसके कर्मचारियों को दी गई कई विशेष सुविधाओं की समीक्षा की और कुछ सुविधाएं वापस ले लीं।
अमेरिकी राजनयिकों के पहचान पत्र, आयात संबंधी विशेषाधिकार और अन्य रियायतों पर भी पुनर्विचार किया गया। सबसे चर्चित कदम अमेरिकी दूतावास के बाहर लगे अतिरिक्त सुरक्षा बैरिकेड्स और सड़क अवरोधकों को हटाना था। भारत ने कहा कि ये सुरक्षा व्यवस्था अमेरिकी दूतावास को विशेष सुविधा के तौर पर दी गई थी।
इसके साथ ही भारत ने देवयानी खोबरागड़े को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में स्थानांतरित कर दिया, जिससे उन्हें पूर्ण राजनयिक प्रतिरक्षा मिल गई।
अमेरिका ने भारत से उनकी प्रतिरक्षा हटाने का अनुरोध किया, लेकिन भारत ने इसे अस्वीकार कर दिया।
बाद में अमेरिका ने उन्हें अवांछित व्यक्ति घोषित किया, जिसके बाद वे भारत लौट आईं। इस पूरे विवाद ने कुछ समय के लिए भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव पैदा कर दिया।
क्या मामला था? मार्च 2016 में पाकिस्तान ने भारतीय नागरिक और पूर्व नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव को गिरफ्तार किया। पाकिस्तान का आरोप था कि जाधव उसकी सीमा के भीतर जासूसी और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल थे। भारत ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जाधव ईरान से व्यवसायिक गतिविधियों के दौरान लापता हुए थे और उन्हें पाकिस्तान ने अवैध रूप से हिरासत में लिया है। अप्रैल 2017 में पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने कुलभूषण जाधव को मौत की सजा सुना दी। इसके बाद मामला भारत और पाकिस्तान के बीच बड़े कूटनीतिक विवाद में बदल गया। भारत का आरोप था कि पाकिस्तान ने वियना कन्वेंशन का उल्लंघन करते हुए जाधव को कांसुलर पहुंच नहीं दी और न ही उन्हें निष्पक्ष कानूनी सहायता उपलब्ध कराई। सरकार ने क्या रुख अपनाया?
नरेंद्र मोदी सरकार ने इस मामले में बेहद आक्रामक कानूनी और कूटनीतिक रुख अपनाया।
मई 2017 में भारत सीधे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) पहुंच गया और जाधव की फांसी पर तत्काल रोक लगाने की मांग की।
भारत ने दलील दी कि पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत भारत के अधिकारों का उल्लंघन किया है।
भारत की अपील पर ICJ ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए जाधव की फांसी पर रोक लगा दी।
जुलाई 2019 में अदालत ने अपने फैसले में माना कि पाकिस्तान ने वियना कन्वेंशन का उल्लंघन किया है, क्योंकि उसने भारत को समय पर गिरफ्तारी की जानकारी नहीं दी और भारतीय अधिकारियों को कांसुलर पहुंच से वंचित रखा।
अदालत ने पाकिस्तान को जाधव की सजा और दोषसिद्धि की प्रभावी समीक्षा करने का आदेश दिया।
हालांकि अदालत ने जाधव की तत्काल रिहाई का आदेश नहीं दिया, लेकिन भारत के लिए यह एक बड़ी कानूनी जीत मानी गई।
क्या था मामला? दिल्ली की रहने वाली उजमा अहमद पाकिस्तान गई थीं। वहां उन्होंने आरोप लगाया कि एक पाकिस्तानी नागरिक ने उन्हें बंदूक की नोक पर शादी करने के लिए मजबूर किया और उनकी इच्छा के विरुद्ध रोके रखा। मामला बेहद संवेदनशील था क्योंकि यह भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहा था। क्या रहा सरकार का रुख? भारत सरकार ने तत्काल हस्तक्षेप किया। इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग ने उजमा को सुरक्षित शरण दी और उन्हें कानूनी सहायता उपलब्ध कराई। तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने व्यक्तिगत रूप से मामले की निगरानी की। पाकिस्तान की अदालत में कानूनी लड़ाई के बाद उजमा को सुरक्षित भारत वापस लाया गया। इस मामले ने दिखाया कि एक आम भारतीय नागरिक के लिए भी भारत सरकार पूरी ताकत से हस्तक्षेप कर सकती है।
क्या था मामला? 14 फरवरी 2019 को पुलवामा आतंकी हमले में 40 सीआरपीएफ जवानों की मौत के बाद भारत ने 26 फरवरी को पाकिस्तान के बालाकोट में स्थित जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी ठिकानों पर हवाई हमला किया। इसके अगले दिन भारत और पाकिस्तान के बीच हवाई संघर्ष हुआ। इसी दौरान भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान का मिग-21 बाइसन विमान पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र में दुर्घटनाग्रस्त हो गया और वे पाकिस्तानी सेना की हिरासत में चले गए। पाकिस्तान ने अभिनंदन के हिरासत में होने के वीडियो और तस्वीरें जारी कीं, जिसके बाद भारत ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। भारत सरकार ने इसे अंतरराष्ट्रीय मानकों और युद्धबंदियों से जुड़े नियमों के खिलाफ बताया तथा पाकिस्तान से उनकी सुरक्षित और तत्काल रिहाई की मांग की। विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि भारत अपने अधिकारी की सुरक्षा को लेकर गंभीर है और पाकिस्तान को जिनेवा कन्वेंशन का पालन करना चाहिए। क्या रहा सरकार का रुख? मोदी सरकार ने इस मुद्दे पर व्यापक कूटनीतिक अभियान चलाया। दुनिया के प्रमुख देशों को स्थिति से अवगत कराया गया और पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा। बढ़ते तनाव और वैश्विक दबाव के बीच पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने संसद में अभिनंदन की रिहाई की घोषणा की। 1 मार्च 2019 को वे अटारी-वाघा सीमा के रास्ते भारत लौट आए।
Source: https://www.amarujala.com/india-news/hormuz-deaths-how-has-india-responded-and-what-has-been-its-stance-in-major-diplomatic-crises-2026-06-13